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March 14, 2026

Press Note – 13.03.2026 _ संसद में शक्तिसिंह गोहिल ने मोदी सरकार के ‘किसान और गांव विरोधी’ एजेंडे को किया बेनकाब

 

प्रेस विज्ञप्ति  १३-०३-२०२६

 

  • संसद में शक्तिसिंह गोहिल ने मोदी सरकार के किसान और गांव विरोधीएजेंडे को किया बेनकाब
  • अपने मित्र अडानी को फायदा पहुंचाने के लिए ग्रामीण अर्थव्यवस्था को किया जा रहा है तबाह

कांग्रेस के राज्यसभा सांसद शक्तिसिंह गोहिल ने उच्च सदन में मोदी सरकार पर तीखा हमला बोलते हुए कहा कि यह सरकार योजनाबद्ध तरीके से भारत की ग्रामीण अर्थव्यवस्था को नष्ट कर रही है। ग्रामीण विकास के मुद्दे पर बोलते हुए गोहिल ने इस बात पर गहरा दुख जताया कि जहां राष्ट्रपिता महात्मा गांधी का मानना था कि भारत की असली आत्मा उसके गांवों में बसती है, वहीं मौजूदा सरकार उसी आत्मा का दम घोंटने पर आमादा है। उन्होंने सदन में जोर देकर कहा कि आज भी हमारे देश की 68 प्रतिशत आबादी गांवों में ही निवास करती है।

मौजूदा सरकार के रवैये की तुलना पुरानी नीतियों से करते हुए गोहिल ने ग्रामीण आजीविका को मजबूत करने में अपनी कांग्रेस सरकार के ऐतिहासिक योगदान को याद किया। उन्होंने बताया कि तत्कालीन प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह और यूपीए चेयरपर्सन सोनिया गांधी के कार्यकाल के दौरान महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (मनरेगा) की शुरुआत की गई थी। इसका मुख्य उद्देश्य ग्रामीण आय को सुरक्षित करना और मजबूरी में होने वाले पलायन को रोकना था।

उन्होंने कहा कि गांवों में जाकर देखिए कि इस योजना ने ग्रामीण परिदृश्य को कैसे बदल कर रख दिया था। इसके बाद उन्होंने कड़े शब्दों में कहा कि अब वे लोग हमारी ग्रामीण अर्थव्यवस्था को बर्बाद करना चाहते हैं, जो महात्मा गांधी की हत्या करने वालों की विचारधारा को मानते हैं।

गोहिल ने अपने भाषण की शुरुआत सरकार द्वारा मनरेगा का ‘गला घोंटने’ के आरोप से की। उन्होंने सदन में चौंकाने वाले आंकड़े पेश करते हुए खुलासा किया कि साल 2025-26 में मनरेगा के लिए 86,000 करोड़ रुपये का आवंटन किया गया था, लेकिन 2026-27 के बजट में इसे घटाकर मात्र 30,000 करोड़ रुपये कर दिया गया। यह सीधे तौर पर 56,000 करोड़ रुपये की भारी कटौती है। उनके अनुसार, केंद्र ने बजट आवंटन में भारी कमी कर दी है और अब कमजोर तरीके से यह दावा करने की कोशिश कर रहा है कि इसका बोझ राज्य सरकारों पर डाल दिया गया है। उन्होंने तंज कसते हुए कहा कि यह बेहद हास्यास्पद है क्योंकि गुजरात जैसे राज्य की सरकार भी भारी कर्ज और ओवरड्राफ्ट से जूझ रही है।

गोहिल ने आगे कहा कि भाजपा ने तो कांग्रेस द्वारा शुरू की गई मनरेगा योजना में भगवान राम का नाम भी जोड़ दिया है। उन्होंने कहा कि आप लोग जोर-जोर से राम का नाम जपते हैं, लेकिन जब ग्रामीण मजदूरों की बात आती है, तो आपने उनकी जीवन रेखा ही काट दी है। गोहिल ने स्पष्ट किया कि वह भी भगवान राम का नाम जपते हैं, लेकिन मोक्ष के लिए, वोटों के लिए नहीं। गुजरात का उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि वहां अंतिम संस्कार के दौरान “राम बोलो भाई राम” जपने की परंपरा है। उन्होंने आरोप लगाया कि भाजपा सरकार ने ठीक यही काम किया है- मनरेगा को “राम बोलो भाई राम” में तब्दील कर दिया है और गरीबों की इस जीवन रेखा को एक प्रतीकात्मक शोक संदेश बनाकर रख दिया है।

इसके बाद उन्होंने दाहोद जिले के धानपुर ब्लॉक के पिपेरो गांव में मनरेगा के कामों में हुई कथित अनियमितताओं की जानकारी सदन को दी और इसके समर्थन में आधिकारिक वर्क ऑर्डर का हवाला दिया। गोहिल के अनुसार, सर्वे नंबर 115 पर एक झील का निर्माण किया गया था, जो कि गुजरात के पूर्व भाजपा मंत्री बाहुभाई खाबड़ के स्वामित्व वाली निजी जमीन है। कुछ ही महीनों के भीतर उसी जमीन पर मनरेगा के तहत झील, वृक्षारोपण का काम, जमीन समतल करने और यहां तक कि एक नहर परियोजना का काम भी पूरा कर लिया गया। इस मामले में दाहोद में पहले ही एफआईआर दर्ज की जा चुकी है और सीबीआई मामले की जांच कर रही है। जब भाजपा के एक सांसद ने उन्हें रोकने की कोशिश की, तो गोहिल ने पलटवार करते हुए कहा कि चूंकि इस मामले में राज्य के एक भाजपा मंत्री शामिल हैं, इसलिए इस मुद्दे को अदालत के विचाराधीन बताकर दबाने की कोशिश की जा रही है ताकि सदन में इस पर चर्चा न हो सके । इस तर्क को निराधार बताते हुए गोहिल ने कहा कि सामग्री आपूर्ति के लिए टेंडर प्रक्रियाओं को कथित तौर पर दरकिनार कर दिया गया था। उन्होंने साफ कहा कि जब कोई मंत्री इसमें शामिल होता है, तो सरकार तकनीकी खामियों के पीछे छिपने की कोशिश करती है।

गोहिल ने तर्क दिया कि ऐसे मामले इस बात का स्पष्ट उदाहरण हैं कि किस तरह ग्रामीण विकास के धन का दुरुपयोग किया जाता है, जबकि गांव की वास्तविक जरूरतें हमेशा नजरअंदाज कर दी जाती हैं। उन्होंने भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (सीएजी) की उन टिप्पणियों का भी हवाला दिया जिनमें कहा गया था कि राष्ट्रीय सामाजिक सहायता कार्यक्रम के तहत अपात्र लोगों को लाभ दिया गया, जबकि कई योग्य नागरिक इससे वंचित रह गए। उन्होंने कहा कि उचित सामाजिक ऑडिट की कमी के कारण ही जनता के पैसे को गलत दिशा में मोड़ने की छूट मिली।

उन्होंने सरकार पर यह भी आरोप लगाया कि वह पहले तो ग्रामीण क्षेत्रों के लिए बड़े आवंटन की घोषणा करती है, लेकिन बाद में संशोधित अनुमानों के जरिए चुपचाप उनमें भारी कटौती कर देती है। आंकड़े देते हुए उन्होंने बताया कि जल जीवन मिशन-राष्ट्रीय ग्रामीण पेयजल योजना के तहत 66,000 करोड़ रुपये के बजट अनुमान को घटाकर 17,000 करोड़ रुपये कर दिया गया। राष्ट्रीय ग्राम स्वराज अभियान का बजट 1,064 करोड़ रुपये से घटाकर 850 करोड़ रुपये कर दिया गया। प्रधानमंत्री आवास योजना का बजट 54,832 करोड़ रुपये से गिरकर 32,000 करोड़ रुपये रह गया। अनुसूचित जनजाति विकास कार्यक्रम का बजट 5,082 करोड़ रुपये से घटाकर 1,580 करोड़ रुपये कर दिया गया, जबकि मिशन वात्सल्य के बजट में भी 600 करोड़ रुपये की कटौती देखी गई।

गोहिल के अनुसार, इन कटौतियों का सीधा असर सामाजिक संकेतकों के बिगड़ने के रूप में सामने आ रहा है। उन्होंने चेतावनी दी कि जैसे-जैसे कॉर्पोरेट अपने पास मौजूद जमीन का विस्तार कर रहे हैं, वैसे-वैसे खेती की जमीन तेजी से कम हो रही है। उन्होंने साफ कहा कि अगर गांव कमजोर होंगे, तो देश अपने आप कमजोर हो जाएगा, क्योंकि कोई भी उद्योगपति उस किसान की जगह नहीं ले सकता जो पूरे देश का पेट भरने के लिए अनाज उगाता है।

गुजरात की स्वास्थ्य स्थिति पर गहरी चिंता जताते हुए उन्होंने कहा कि राज्य में 68 प्रतिशत गर्भवती महिलाएं एनीमिया (खून की कमी) की शिकार हैं, जो पूरे भारत में सबसे ज्यादा है। इसके अलावा लगभग 60 प्रतिशत किशोर भी एनीमिक हैं। यह एक ऐसा बड़ा संकट है जो मुख्य रूप से ग्रामीण क्षेत्रों में फैला हुआ है, लेकिन सरकार इसे लगातार नजरअंदाज कर रही है।

गोहिल ने सदन को यह कहकर और भी चौंका दिया कि एक तरफ मोदी के नेतृत्व वाली सरकार ग्रामीण योजनाओं के बजट में भारी कटौती कर रही है, तो दूसरी तरफ अपने कॉर्पोरेट दोस्तों को जमकर जमीन और रियायतें बांट रही है। उद्योगपति गौतम अडानी का नाम लेते हुए गोहिल ने कहा कि सरकार कृषि भूमि, चरागाह और गांवों की साझा जमीन के विशाल हिस्सों को औद्योगिक परियोजनाओं के लिए अडानी समूह को सौंपने पर आमादा दिख रही है। उन्होंने चेतावनी दी कि जब इस तरह की जमीन सामुदायिक नियंत्रण से बाहर हो जाती है, तो पूरा ग्रामीण पारिस्थितिकी तंत्र ढह जाता है। किसान अपनी उपजाऊ जमीन खो देते हैं, पशुपालक समुदायों से चरागाह छिन जाते हैं और कृषि तथा डेयरी पर टिकी गांव की अर्थव्यवस्था पूरी तरह चरमराने लगती है।

भाजपा सरकार के उन दावों पर भी गोहिल ने जमकर तंज कसा जिनमें कहा जाता है कि अब ग्रामीण भारत में रसोई गैस आसानी से उपलब्ध है। उन्होंने व्यंग्यात्मक लहजे में पूछा कि अगर हालात इतने ही अच्छे हैं, तो क्या अब गांव वाले अपनी रोटियां नालियों और गटर से निकलने वाली गैस से पकाएंगे? गौरतलब है कि प्रधानमंत्री मोदी ने कभी यह दावा किया था कि अपनी युवावस्था में उन्होंने गुजरात के स्थानीय गटर से निकलने वाली गैस का उपयोग करके चाय बनाई थी।

कठोर कृषि कानूनों के खिलाफ कड़ा विरोध प्रदर्शन करते हुए अपनी जान गंवाने वाले हरियाणा और पंजाब जैसे राज्यों के किसानों को भावभीनी श्रद्धांजलि देते हुए गोहिल ने कहा कि उनके इसी संघर्ष ने अंततः सरकार को उन कानूनों को वापस लेने पर मजबूर कर दिया। अपने भाषण के अंत में उन्होंने एक गंभीर चेतावनी देते हुए कहा कि सत्ता तो अस्थायी होती है, लेकिन ग्रामीण भारत को कमजोर करके जो नुकसान पहुंचाया जा रहा है, उसका असर कई पीढ़ियों तक भुगतना पड़ सकता है।

पौराणिक कथाओं का संदर्भ देते हुए गोहिल ने केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान से कहा कि वे किसानों के लिए एक अच्छे “मामा” बनें और भगवान कृष्ण के उस क्रूर मामा ‘कंस’ की तरह न बनें जिसे इतिहास में सिर्फ उसके अन्याय और अत्याचार के लिए याद किया जाता है।

 

 

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